भारत में Private school कैसे शिक्षा को व्यापार बना रहे हैं? फीस, यूनिफॉर्म, ट्यूशन, RTE और शिक्षक शोषण की पूरी सच्चाई पढ़ें।

आज अगर कोई अभिभावक अपने बच्चे का एडमिशन किसी प्राइवेट स्कूल में करवाता है, तो वह सिर्फ़ पढ़ाई की फीस नहीं देता, बल्कि एक पूरा पैकेज खरीदता है। किताबें स्कूल से, यूनिफॉर्म स्कूल से, जूते–बेल्ट स्कूल से, कॉपी–किताब की दुकान भी स्कूल तय करेगा। बाहर से कुछ लाने की आज़ादी है तो बस एक चीज़ की—ट्यूशन।
अब सवाल उठता है: अगर सब कुछ स्कूल ही तय करेगा, तो शिक्षा कहाँ है?
स्कूल या शॉपिंग मॉल?
आज का Private school किसी शिक्षा मंदिर की तरह नहीं, बल्कि एक मॉल की तरह काम करता है। हर साल नया सत्र आते ही माता-पिता की जेब पर पहला हमला होता है—नई किताबें, नई ड्रेस, नया पैटर्न। पुराने कपड़े या किताबें किसी काम की नहीं बचतीं।
| खर्च का प्रकार | औसत वार्षिक खर्च (₹) |
|---|---|
| किताबें | 4,000 – 8,000 |
| यूनिफॉर्म | 3,000 – 6,000 |
| जूते, बेल्ट, टाई | 1,500 – 2,500 |
यह सब उन स्कूलो में हो रहा है जो दावा करते है कि वह “नॉन-प्रॉफिट” है।
शिक्षा एक अधिकार या स्टेटस सिंबल
सरकारी स्कूल और समाज की सोच
अगर बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े तो “स्टेटस गिर जाता है”—यही सोच बैठी है समाज में।
Private school का स्टेटस गेम
स्विमिंग पूल, स्मार्ट क्लास, AC बस—लेकिन लर्निंग आउटकम पर चुप्पी |
ड्रेस कोड बदलो, पैसा कमाओ
स्कूलों की सबसे आसान कमाई ड्रेस से होती है। रंग बदला, डिजाइन बदला, जूते का ब्रांड बदला—और हर बच्चा मजबूर। माता-पिता चाहकर भी मोलभाव नहीं कर सकते क्योंकि दुकान तय होती है।
यह ऐसा व्यापार है जहाँ ग्राहक खुद स्कूल के पास आता है, दुकानदार ग्राहक का इंतज़ार नहीं करता।
शिक्षा बनाम स्टेटस
समस्या सिर्फ़ पैसों की नहीं है, समस्या सोच की भी है।
अगर बच्चा सरकारी स्कूल जाता है, तो कॉलोनी में स्टेटस गिर जाता है—ऐसी मानसिकता बना दी गई है। प्राइवेट स्कूल इसी मनोविज्ञान पर खेलते हैं।

एडमिशन के समय कोई नहीं पूछता:
- बच्चे ने क्या सीखा?
- लर्निंग आउटकम क्या है?
बल्कि दिखाया जाता है:
- स्विमिंग पूल
- स्मार्ट क्लास
- AC बस
फीस का अंतहीन सिलसिला
एक बार एडमिशन फीस देने के बाद लगता है कहानी खत्म हो गई, लेकिन असल खेल तब शुरू होता है।
| फीस का नाम | असलियत |
|---|---|
| एनुअल चार्ज | हर साल |
| मिसलेनियस फीस | कभी स्पष्ट नहीं |
| डेवलपमेंट फीस | विकास दिखता नहीं |
| कंप्यूटर फीस | ऑनलाइन क्लास में भी |
हर साल फीस बढ़ाने का एक ही तर्क—“स्कूल को नुकसान हो रहा है”। लेकिन कोई भी स्कूल कभी घाटे में दिखता ही नहीं।
ऑनलाइन क्लास, फिर भी ऑफलाइन फीस
कोविड के दौरान जब स्कूल बंद थे और क्लास ऑनलाइन चल रही थी, तब भी:
- ट्रांसपोर्ट फीस ली गई
- कंप्यूटर लैब फीस ली गई
और जिन्होंने फीस नहीं दी, उनके बच्चों को ऑनलाइन क्लास से बाहर कर दिया गया। शिक्षा अधिकार नहीं, पासवर्ड-प्रोटेक्टेड सर्विस बन गई।
शिक्षकों का शोषण: सिस्टम की रीढ़ टूटी हुई
Private school की कमाई का एक बड़ा राज़ है—शिक्षकों का शोषण।
- काग़ज़ों में सैलरी: ₹25,000
- हाथ में मिलती है: ₹6,000 – ₹8,000
कई स्कूल शिक्षकों से चेकबुक या ATM कार्ड तक रखवा लेते हैं। दिन में सैलरी जमा, रात में निकासी।
यही कारण है कि ज़्यादातर प्राइवेट स्कूल शिक्षक 35 साल तक सरकारी नौकरी की तैयारी करते रहते हैं।
ट्यूशन सिस्टम क्यों फल-फूल रहा है?
एक आम शिकायत है—
“जो बात स्कूल में पूरे दिन में नहीं समझ आती, वही ट्यूशन में आधे घंटे में समझ आ जाती है।”
कुछ शिक्षक जानबूझकर स्कूल में कम पढ़ाते हैं ताकि ट्यूशन की माँग बनी रहे।

नतीजा:
- स्कूल से शिक्षा नहीं
- ट्यूशन से शिक्षा, लेकिन महँगी
रिजल्ट का आधा सच
रिजल्ट आते ही स्कूल के बाहर बैनर लग जाते हैं—टॉपर हमारा।
लेकिन पूरा रिजल्ट क्यों नहीं दिखाया जाता?
| स्कूल | पास प्रतिशत |
|---|---|
| नवोदय विद्यालय | ~99% |
| केन्द्रीय विद्यालय | ~98% |
| प्राइवेट स्कूल | चयनित डेटा |
नवोदय और KVs बिना विज्ञापन के सालों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
RTE Act और 25% सीटों की सच्चाई
RTE कानून कहता है कि 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए होंगी।
हकीकत:
- फर्जी दस्तावेज़
- सीट बेचना
- गरीब बच्चों के आवेदन रिजेक्ट
क्यों? क्योंकि प्राइवेट स्कूल का पूरा मॉडल स्टेटस पर टिका है।
ट्रस्ट, सोसाइटी और प्राइवेट कंपनी का खेल
काग़ज़ों में स्कूल नॉन-प्रॉफिट होते हैं, लेकिन असल में:
- स्कूल
- ट्रस्ट/सोसाइटी
- ट्रस्ट की अपनी प्राइवेट कंपनी
स्कूल महँगा सामान उसी कंपनी से खरीदता है। फायदा स्कूल को नहीं, कंपनी को।
CSR फंड: सफेद को सफेद करने की मशीन
CSR के नाम पर कंपनियाँ पैसा देती हैं, स्कूल कमीशन काटकर वापस लौटा देता है।
कंपनी टैक्स बचाती है, स्कूल पैसा बनाता है।
RTI: माता-पिता का सबसे बड़ा हथियार
RTI से आप जान सकते हैं:
- ट्रस्ट में कौन सदस्य हैं
- फीस ऑडिट हुआ या नहीं
- RTE लागू है या नहीं
₹10 की RTI कई करोड़ की सच्चाई खोल सकती है।
समाधान क्या है?
- सरकारी स्कूलों का सही प्रचार
- फीस पर सख्त नियंत्रण
- नियमित ऑडिट
- माता-पिता की जागरूकता
सरकारी और कानूनी संदर्भ
- भारत सरकार – शिक्षा का अधिकार (RTE Act) का अधिकार और उद्देश्य
https://www.education.gov.in/rte — - Right to Education Act, 2009 (RTE) – पूरी जानकारी (Wikipedia)
https://en.wikipedia.org/wiki/Right_of_Children_to_Free_and_Compulsory_Education_Act%2C_2009 —
मेरी राय (Author Opinion)
मेरे अनुसार एक मिडिल क्लास के बच्चे के पास पैसे नहीं होते और भविष्य की गारंटी नहीं होती ऐसे में निजी स्कूलों का ऐसे लूटना उनके भविष्य पर दुष्प्रभाव डालने जैसा है मेरेअनुसार सरकार को इस पर कढ़े नियम बनाने चाहिए और सभी स्कूलों को नियम का पालन करना चाहिए|
Disclaimer
यहां पर हम जो भी जानकारी लिखते हैं वो सिर्फ एजुकेशन पर्पज के लिए लिखते हैं और इस ब्लॉग में जो भी डेटा का उपयोग किया गया है वो पुराने तथ्यों पर आधारित है या अनुमानित है कृपया इसे पूरी तरह से सही नहीं माने और अगर आपको कोई फैसला लेना हो तो आप किसी विशेषज्ञ की सलाह ले सकते हैं|
निष्कर्ष
शिक्षा सबसे बड़ा दान है, लेकिन आज यह सबसे बड़ा धंधा बन चुकी है। जब तक माता-पिता सवाल नहीं पूछेंगे और सरकार नियमों को कड़ाई से लागू नहीं करेगी, तब तक स्कूल बच्चों को नहीं, बैलेंस शीट को प्राथमिकता देते रहेंगे।
FAQs
Q1. क्या प्राइवेट स्कूल मुनाफा कमा सकते हैं?
नहीं, कानून इसकी अनुमति नहीं देता।
Q2. क्या स्कूल किताबें और ड्रेस जबरन बेच सकते हैं?
नहीं, यह अवैध है।
Q3. RTE Act का उद्देश्य क्या है?
गरीब बच्चों को समान शिक्षा देना।
Q4. RTI से क्या फायदा है?
स्कूल की असलियत सामने आती है।
Q5. सरकारी स्कूल क्या वाकई खराब हैं?
नहीं, कई मामलों में वे बेहतर हैं।
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